Zindhgi ka safar

 मत पूछो इस जिंदगी में 

कैसा कैसा मंजर देखा है 

गैरों के हाथों में मरहम 

अपनों के हाथ में खंजर देखा है 

मुर्दो के पीछे चलती भीड़

को भी हंसते देखा है 

दिल की बंद डिब्बियो मे 

कई राज छुपाए बैठे है 

अपने ही अपनों से 

अपना स्वार्थ लगाए बैठे है 

न जाने कैसी कैसी शिकायतों का 

शिकार होते देखा है 

बिना जुर्म किए खुद को 

गुनाहकार होते देखा है

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